Sunday, August 31, 2025

প্রতিবেশী



আমার ঠিক পাশের বাড়ি।  বাড়ি নয়। একতলার ফ্ল্যাট। আমারও ওদেরও। শুধুমাত্র একটাই দেওয়ালের ব্যবধান। দেওয়ালের উপর রেলিং। রেলিংটা ডিঙ্গোতে পারলেই ওদের ফ্ল্যাটের বাড়ানো ববারান্দায় গিয়ে পড়বো।  

রেলিং কিন্তু কখনোই ডিঙ্গোইনি। 

কথাও খুব একটা বেশি হয় না । ওই মাঝে মধ্যে "কি কেমন আছেন?  ভালো?" এই ধরনের আদান প্রদান। কিন্তু ওই বাড়ির বৌদিকে দেখেছি সকাল সকাল  ভেজা কাপড়গুলো বারান্দায় মেলতে। দেখে মনে পড়ে গেছে আমাকেও কাপড় ধুয়ে মেলতে হবে। ওদের বাড়ির কাজের লোকটি ঠিক আসে দুপুরে। এই বারোটার থেকে একটার মধ্যে। আমি ভিতর ঘর থেকেই আওয়াজ পাই। তারপর তার বারান্দা ধোয়ার শব্দ শুনে মনে হয় সবকিছু ঘড়ির কাঁটার তালে তালে চলছে। 

আশ্বস্ত হই।

রাত্রে সদর দরজায় তালা লাগাতে গিয়ে এক ফাঁকে ওদের দরজার দিকে উঁকি মারি। আমার ব্যালকনি থেকে ওদের দরজাটা দ্যাখ যায়। না: ! আলো জ্বলছে। লোহার জাল দেওয়া দরজাটা ভ্যাজানো। কিন্তু ভিতর ঘরের মানে বসবার ঘরের কিছুটা অংশ দ্যাখা যায় যতক্ষণ না কাঠের দ্বিতীয় দরজাটা বন্ধ করা হয়। আমার ফ্ল্যাটেরো ওই রকমই প্যাটার্নের দরজা। 

লোক দ্যাখা যায় না বটে কিন্তু মৃদু গলার শব্দ পাই। কথার টুকরো ছুটে আসে। নিঃশ্বাস ফেলি। সব ঠিক আছে। ঘড়িতে বাজে দশটা। 

নিশ্চিন্ত হই।

***

কিছুদিন হলো ওদের ফ্ল্যাটের দরজাটা বন্ধ। কাঠের দরজাটাও। মহিলাকেও দেখতে পাচ্ছি না। ভেজা কাপড় দড়িতে ঝুলছে না। ওনার আবার ফুঁসফুসের ব্যামো আছে। প্রায়:সই দমকা কাশির আওয়াজ পাই। বেশ কিছুদিন সেই আওয়াজটাও পাচ্ছি না। 

ভাবি মেয়ের বাড়ি হয়তো বেড়াতে গেছেন। বা হয়তো ছেলের কাছে। অস্ট্রেলিয়ায়? ছেলের বউয়ের সাথে তেমন বনিবনা ছিল না। কিন্তু দুরত্বে মনের টান বাড়ে। হয়তো নাতনির কথা মনে পড়ে গিয়ে মন কেমন কেমন করে উঠেছে। দুপুরে বেলা কাজের মেয়েটি কিন্তু রোজ আসছে। হয়তো ওর কাছে বাড়ির চাবি দেওয়া আছে। অনেকদিনের বিশ্বস্ত কাজের লোক!

দীর্ঘনিশ্বাস ফেলি।

***

মনটা উদাস হয়ে গেলো। বিদেশ মানে তো মাস খানেকের ধাক্কা। 

একা একা লাগে। ব্যালকনিতে আর বসি না । ভয় ভয় করে। আমিতো একা থাকি। পাশের বাড়ির ওরা না থাকাতে ভরসা পাই না। কিসের ভরসা ? 

যদিও আগেই বলেছি খুব একটা আলাপচারিতা হতো না। কিন্তু তবুও মানুষের নীরব উপস্থিতিও প্রতিদিনকার জীবন যাত্রার একটা বিশাল  জায়গা জুড়ে থাকে। পাড়াটা বড়ই চুপচাপ মনে হচ্ছে। সন্ধ্যার পর নিঃশব্দতা যেন আরো গাঢ় হয়ে উঠছে। ছোটখাটো খুটখাট শব্দগুলোও নির্জনতা ভেদ করে শেলের মতো বিঁধছে। অদ্ভুত এক ভয়াবহ পরিবেশ সৃষ্টি করছে। 

ভাবছি কিছুদিনের জন্য অন্য কোথাও ঘুরে আসব। বন্ধুর বাড়ি। বা কোনো আত্মীয়র কাছে। কিন্তু সবাই আজকাল বড় ব্যস্ত। সময়ের সবার কাছে বড় অভাব।

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কাল দুপুরে শুনি পাশের ফ্ল্যাটের সদর দরজা খোলার আওয়াজ। কাজের মেয়েটি বোধহয় এসেছে। কান লাগিয়ে আরেকবার শুনি। কেউ যেন দরজা খুলে দিল মনে হলো। চাবি ঘোরানোর আওয়াজ তো পেলাম না।

বাইরে বেরিয়ে দেখি মেয়েটি বারান্দা ধুচ্ছে। ভাবলাম জিজ্ঞেস করি। তারপর ভাবলাম যদি কিছু মনে করে। তাই আর প্রশ্ন করি না। যাওয়ার সময় মনে হলো কেউ যেন দরজা ভিতর থেকে বন্ধ করলো। তাহলে কি ওরা আছে?

***

পরের দিন সকালে মহিলার গলার আওয়াজ পেলাম। বাইরে বসে স্বামী স্ত্রী দুজনে চা খাচ্ছেন। ফ্ল্যাটের দরজাটাও খোলা। আসতে যেতে নজরে পড়ছে। কাজের মেয়েটি দুপুরে এসেছে। মহিলার সঙ্গে কথাবার্তাও টুকটাক চলছে। সংসারের নানান আলাপ আলোচনা ভেসে আসে। 

ঘড়ি দেখি। মিনিটের আর সেকেন্ডের কাঁটাগুলো নিজেদের তালে তালে ঠিক চলেছে। ন পিসিকে বলেছিলাম সপ্তাহ খানেকের জন্যে ঘুরে যাবো। ভাবছি আজ ফোন করে যাওয়ার প্রোগ্রামটা ক্যান্সেল করে দেব।

কি বলেন?






Friday, August 08, 2025

লাম লামা

আমাদের এক দূর সম্পর্কের আত্মীয় ছিলেন। কাঠ বাঙ্গাল। তাঁর হিন্দী ছিল ভীষন ভাবে বাঙ্গাল ঘ্যাসা  মানে হেভিলি এক্সেন্টেড। কিন্তু তাই বলে কি উনি আলাপচারিতায় পিছ পা ছিলেন। মোটেই না। বরং আগ বাড়িয়ে পথযাত্রীদের সঙ্গে  অশুদ্ধ হিন্দীতে ওনার বার্তালাপ-এর গল্পো ছিল আমাদের হাঁসির খোরাক।

যেমন বাস স্ট্যান্ডে বাসের জন্য অনেক ক্ষণ অপেক্ষারত থেকে সময়ে বাস না পাবার আক্ষেপ জানাতেন পাশের যাত্রীকে, "পইলে ২১৩ নম্বর বাস বহুত ঘন ঘন আতা থা। আজকাল ক্যা হো গেয়া। অনেক প্যারাশানি হোতা হ্যায়।" পাশের আগুন্তুকটি ও কি বুঝে মাথা নাড়িয়ে সায় দিতেন। 

একবার বাসে চড়ে মালভিয়া নগর যাচ্ছিলেন সেই মেসোমশাই। জায়গাটি অপরিচিত হওয়ায় বাসের কন্ডাক্টর কে উনি অনুরোধ জানালেন, " মালব্ব নগর আনে সে হামকো লামা দেনা"। কন্ডাক্টরটি ও ছিল রসিক বটে। স্টপ টি আসাতে উনি মেসোমশাইকে বল্লেন, "অব আপ লাম যাও"।

আমার মা বিবাহের পূর্বে অনেক বছর দিল্লীবাসিনী ছিলেন। সেই দেশ বিভাগের আগে মামাদের কাছে আসা তারপর আর ফিরে যাওয়া হয়নি। কিন্তু মার হিন্দীতে ও বাংলা টান ছিল প্রবল। মা কিছুতেই হ্যায় বলতে পারতেন না। হয়ে যেতো হায়। আমরা এ  নিয়ে প্রচুর হাঁসি ঠাট্টা করতাম।

আমাদের বাড়িওয়ালি ছিল ঠেট পাঞ্জাবি। কিন্তু মা দিব্যি ওঁর সঙ্গে আলাপ চালিয়ে যেতেন। উনি ওনার ভাষায় মা নিজের ভাষায়। পরে মাকে যখন আমরা জিজ্ঞেস করতাম উনি কি বললেন মা বুঝেছেন কিনা মা ঘাড় নাড়িয়ে জবাব দিতেন, "না"। ওনার ও অবস্থা নিশ্চই ছিল তথৈবচ কিন্তু দুজনে দুজেনের কথা সসম্মানে ও সাগ্রহে শুনতেন অধৈর্য্য না হয়ে। একেই বোধহয় সভ্যতা বা ভদ্রতা বলে।

তখন কার দিনের মানুষরা ভিন্ন প্রকারের ছিলেন। তাদের বোধ, সংস্কার, ভদ্রতা জ্ঞ্যান ছিল অন্য। আজ তাঁরা নেই । সেই মুল্যবোধ ও আর নেই।

Tuesday, July 29, 2025

एक अधूरी कहानी

अजीत  बाबु एक साधासीधा जीवन व्यतीत करनेवाले आम नागरिक थे।  घर संसार भरापूरा  ही था  पर मन में शांति न थी। बीवी नौकरीशुदा थी , बच्चे नामी प्राइवेट स्कूल में पढ़ते थे। आमदनी अच्छी थी इसलिए खर्चों से परहेज़ न था।  पर जैसा कि मैंने पहले कहा अजीत बाबु दिली तौर  पे खुश न थे। 

उनके लिए शादी एक समझौता ही था । ऐसा समझौता जो उनके माता पिता ने उनको करने पर मजबूर किया था। अगर होती उनकी शादी कुसुम से तो जीवन के मायने ही बदल जाते। फिर तो रोज़ शामो सहर सतरंगी रंगों से रंग जाते। अब क्या है?  सुबह ऑफिस जाना शाम को ऑफिस से घर आना, गृहस्थी के नाना प्रकार के खर्चों का ब्योरा रखना, खर्चे कम क्यों नहीं हो पा रहे हैं उसपे सुशीला से बहस करना और फिर खाना खाकर सो जाना। हां, उनकी पत्नी का नाम सुशीला ही थी । पढ़ी लिखी, सुघड़, समझदार और सहनशील । मां ने यही सारे गुणों को देखते हुए अपने "नासमझ" बेटे के लिए उसे चुना था। चुनाव सांसारिक अनुभवों पर आधारित था प्यार मोहब्बत के दावों पर नहीं। 

सुशीला ने वैवाहिक जीवन के प्रारंभिक कुछ महीनों में ही भांप लिया था कि उनके पति का मन जीतना उसके लिए संभव नहीं है। फिर भी गृहस्थी के सारे कर्तव्यों को बिना शिकायत ही उसने बड़ी सूझबूझ से निभाने का बीड़ा उठा लिया था। बच्चों को पढ़ाना, घर संभालना, खाना बनाना और एक समय अजीत बाबू के नौकरी छूट जाने पर घर के पास एक स्कूल में वरिष्ठ शिक्षिका का पदभार संभाल लेना उसके निजी निर्णोयों में से कई थे। अपने पति से पूछना आवश्यक नहीं , ऐसा न था, पर सुशीला जानती थी अजीत के शख्सियत में ठोस निर्णय लेने की क्षमता ना के बराबर ही था। इसलिए सुशीला, जो भी घर और बच्चों के खुशी के लिए ठीक समझती, अपने आप ही सब कर लेती। अजीत बाबू को कभी कभी महीनों बाद पता चलता कि घर के रुटीन में कोई परिवर्तन हुआ है। वे सोचते कुसुम होती तो मुझको खुद ही बताती पर ये तो सुशीला है। ये क्यों मुझे बताएंगी? सुशीला तो इस घर की एकछत्र मालकिन है। अजीत बाबू तो सिर्फ पैसे कमाने की मशीन बन कर रह गए है। इत्यादि...

मुद्दे की बात यह थी कि सुशीला और अजीत संसार नामक गाड़ी के दो पहिए जरूर थे पर गाड़ी फिर भी ज़िंदगी के दो समांतराल ट्रैकों पर चल रही थी। गाड़ी उलट नहीं रही थी इसका श्रेय अजीत बाबू अपने ए टी एम कार्ड को देते थे । सुशीला की इसमें कोई  बौद्धिक, वित्तीय या भावनात्मक सहयोग उनको दिखाई नहीं पड़ता था। किसी भी सांसारिक समस्या का समाधान या निष्पादन "अगर कुसुम होती तो ...." से शुरू होकर वही खत्म हो जाता था। 

****

अजीत और कुसुम किसी ज़माने में पड़ोसी हुआ करते थे। धीरे धीरे उनके विशुद्ध दोस्ती में प्यार का समायोजन हुआ। कुसुम खूबसूरत होने के साथ साथ बातें भी बहुत मिठी मिठी करती थीं। उसे अजीत से हमदर्दी था। उसकी माली हालत कुसुम के पारिवारिक समृद्धियों से कम था। अजीत के पिता नौकरी पेशा थे और कुसुम के पिता सुलझे हुए व्यापारी। 

कुसुम ने अजीत को, हर हालात में कंधे से कंधा मिलाकर चलने का, आश्वासन दिया था। अजीत दृढ़ निश्चित था कि कुसुम ऐसा ही करेगी। परन्तु प्यार में बह जाने के बावजूद अजीत अपने पिता के समक्ष कभी यह कह न पाया कि कुसुम से वह विवाह करना चाहता है। कुसुम ने भी इस बात पर कभी जोर नहीं दिया। दूर क्षितिज पर विवाह का तारा टिमटिमाता रहा और वे दोनों उस तारे को देख देख फूले न समाते। पर किसी ने भी इस योजना को कार्यान्वित करने की पहल नहीं की।

और एकदिन कुसुम की शादी हो गई। अजीत के माताश्री को उसकी मानसिक स्थिति तब ज्ञात हुई जब वह सी ए की अंतिम परीक्षा पास न कर सका। 

दो साल बाद अजीत के सी ए बनते ही उन्होंने सुशीला का चयन कर सामाजिक स्वीकृति के साथ घर ले आए।

प्रेम का झिलमिल तारा बुझ सा गया। पर क्षितिज पर उसकी मृत रोशनी की एक रेखा , पता नहीं कैसे, समय के उतार चढ़ाव को अमान्य कर, जीवित रही। वो रेखा घर जलाने के काबिल न थी। पर वह अजीत के मन को प्रतारित करता रहा।

और सुशीला, सब कुछ जानते हुए भी कभी सवाल जवाब में न उलझ, अपने बच्चों के भाग्यों को संवारने में जुटी रही।

***

फिर एकदीन अकस्मात , जैसे कुसुम अजीत बाबु के जीवन से निष्कासित हुई थी वैसे ही दोबारा आ धमकी। धमाका ही था मानिए। धमाके कहके नहीं फूटते। अचानक विस्फोट तहस नहस कर अपनी बंजर निशानियां छोड़ जाती है। पुनर्वार उसकी आने की कल्पना कर मनुष्य सहम जाता है पर उसे बुलाने की तजवीज नहीं करता। 

अजीत बाबु ऑफिस के किसी कलिग के शादी पे एक शाम के लिए शहर के बाहर जाने पर विवश हो गए। वैसे तो उन्हें घर से ऑफिस और ऑफिस से घर के अलावा कहीं और जाने का मन नहीं करता था पर कलिग के साथ अच्छे संबंध थे तो मना न कर पाए। ढाई सो किमी की दूरी अधिक तो नहीं पर सुशीला के हाथ की चाय न जाने क्यों बहुत याद आने लगी। 

बहरहाल शादी के मंडप पर पहुंच अपने बाकी कलिगों को ढूंढते ढूंढते नजर एक जगह जाकर गढ़ गई। एक अकेली औरत भीड़ से थोड़ी दूर एक कुर्सी पर बैठी किन्हीं सोचों में गुम सी लग रहीं थीं। उसकी शक्ल काफी जानी पहचानी सी  थी। कीमती सारी, गहनों और मेक अप से लदी हुई। वैसे तो मक अप की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि उसकी व्यक्तित्व में एक अलग ही बात थी। गंभीरता के साथ साथ एक अजब उदासी। जैसे की मुसाफिर रास्ता भूल कहीं और भटक गया हो। पता तो मालूम था पर याद न आ रहा हो। एक घबड़ाहट, एक बेचैनी, एक गलती का अहसास जैसे कचोट रहा हो। 

अजीत बाबु को चंद सेकंड लगे पहचानने में। पहले शक सा हुआ  ये वही तो नहीं? फिर एक टक देखने के बाद यकीन हुआ हां यह वही तो है। कुसुम... हमारी कुसुम...मेरी कुसुम। अजीत बाबु भूल गए कि जिस कुसुम को वे जानते थे , जिस कुसुम के अनुराग में वे मुग्ध हो जग परिवार को त्यागने का एक समय निर्णय ले चुके थे उस कुसुम और इस अधेड़ उम्र की महिला में वर्षों का फासला था। 

अजीत बाबु आगे बढ़े। कुर्सी तक पहुंच कर थोड़ा आगे झुक कर नम्रता से संबोधित किया, "कुसुम! तुम कुसुम ही हो न? मुझे पहचाना?" वह महिला चौंक कर अजीत बाबु की तरफ देख कर बोली, "आप मुझे जानते हैं? मैंने आपको पहचाना नहीं" । अजीत बाबु झेंप गए। क्या एक ही नाम और शक्ल के दो शख्स हो सकते हैं? क्या उन्होंने हड़बड़ी में कोई गलती कर डाली? क्या ये वो कुसुम नहीं? इन प्रश्नों के उत्तर ढूंढते हुए अजीत बाबु को ये ख्याल ही नहीं आया कि इतने सालों बाद उनकी प्राक्तन प्रेमिका उसे भुला सकती है या उसे न पहचानने का ढोंग कर सकती है।

अजीत बाबु कुसुम को याद दिलाने ही वाले थे कि एक हंसमुख व्यक्ति उनकी ओर बढ़े और पूछा, " क्या आप मेरी पत्नी से बात कर रहे हैं? क्या आप उनके पूर्व परिचित हैं? अजीत बाबु फिर झेंप गए। उन्होंने कैसे भुला दिया कि कुसुम शादी शुदा है। उनकी इस तरह एक शादी शुदा स्त्री से आगे बढ़ कर बात नहीं करनी चाहिए थी। पर उसके तुरंत बाद ही उनको ख्याल आया कि वे तो कुसुम को शादी से पहले से ही जानते थे। तो इसमें क्या ही हर्ज है कि उन्होंने किसी पुराने मित्र से वार्तालाप करने की पहल की । हां, प्रेमिका से पहले कुसुम उनकी दोस्त ही तो थी। सबसे अच्छी दोस्त।

अजीत बाबु ने सर हिलाकर हामी भरी। वह अपरिचित, हंसमुख व्यक्ति थोड़े झिझके । फिर बड़ी क्षमापूर्ण स्वर में बोले, " बुरा मत मानिएगा। मेरी पत्नी को अल्जाइमर है यानी भूलने की बीमारी। उन्हें आप शायद याद न हो"।

अजीत बाबु सकपकाकर बोले, "अल्जाइमर?" वह तो वृद्धावस्था के लक्षण है"। 

कुसुम के पति ने अजीत बाबु की बात को काटते हुए कहा, " नहीं ये एक गलतफहमी है। अल्जाइमर किसी भी उम्र में हो सकती है। कुसुम को तो शादी के कुछ साल बाद ही हो गया था। पर आप कुसुम को कैसे जानते हैं?"

अजीत बाबु उत्तर न दे सके। क्या वह अपराधबोध था या अचानक एक बड़ा झटका लगने का ट्रॉमा? अजीत बाबु को समझ न आया। उनके आंखों के सामने उनके कॉलेज के दिन, कुसुम से परिचय, उससे दोस्ती फिर प्रथम प्रणय निवेदन, पहले पहले छुप छुप के मिलना फिर साहस संचित होने के बाद किसी की परवाह न करते हुए एक दूसरे से घुलना सब आंखों के सामने सिनेमा के दृश्यों की तरह एक के बाद एक तैरने लगा। 

अजीत बाबु ज्यों त्यों शादी के मंडप से बिना कुछ खाए, बिना अपने कलिगों से मिले, बिना नव दंपति को मुबारकबाद दिए  किसी तरह निकल आए। रात हो चुकी थी। रास्ते सुनसान हो गए थे। चलते चलते अजीत बाबु कहां निकल आए थे उन्हें भी नहीं पता था। केवल मन के अंगने में एक मुरझाई हुई फूलों की क्यारी सुगंधहीन, रंगहीन दिखाई पड़ रही थी। 

और तभी सुशीला की मुखमंडल अजीत बाबु के आंखों के आगे चमकने लगी। भूख का एहसास होते ही सुशीला के हाथ की बनाई हुई रोटी , सब्जी और अचार अनायास ही मुंह में पानी का संचार करने लगी। शादी पे जाना है सुनके सुशीला ने अपने हाथों से अजीत बाबु के पहने हुए कपड़े प्रेस कर दिए थे। उसकी हाथों के स्पर्श अजीत बाबु मानो कपास के बुनाई में अनुभव करने लगे। इतने वर्षों बाद अजीत बाबु को अनुभव हुआ कि सुशीला ने बड़ी ही निपुणता से उनकी गृहस्थी संभाली है, बच्चों की लिखाई पढ़ाई में मदद, अनुशासन और देखभाल की है , सांस ससुर की सेवा में कोई कमी नहीं रखी है और अजीत बाबु के कंधे से कंधा मिलाकर बुरे दिनों में नौकरी कर संसार धर्म निभाया है। 

आज उस जनमानवहिन सड़क पर खड़े खड़े अजीत बाबु की आँखें सुशीला और उसकी दायित्वबोध , सहनशीलता और बुद्धिमत्ता की प्रशंसा से भर आई। कभी कभी हीरा हाथ के पास होते हुए भी उसका मूल्यांकन करने में इंसान चूक जाता है। अजीत बाबु खुद को कोस ही रहे थे कि पीछे से क्रिंग क्रिंग की आवाज आई। अजीत बाबु ने मुड़ कर देखा तो एक ऑटो दृश्यमान हुआ। हाथ बढ़ाकर ऑटो को रोकते हुए जोर से वे बोले, "स्टेशन"।

***

अजीत बाबु की अधूरी प्रेम कहानी यही समाप्त होती है परंतु पाठक पाठिकाओं के लिए कुछ मूल प्रश्न भी छोड़ जाती है। क्या इस घटना के पश्चात अजीत बाबु अपनी रोजमर्रा के जीवन में संतुष्टि ढूंढ पाएंगे ? क्या उनको कुसुम की याद अब भी सताएगी? और जब जब कुसुम याद आएगी क्या वे सुशीला के साथ खर्चों का ब्यौरों को लेकर तर्क वितर्क में लिप्त होंगे ?

मनुष्य एक अद्भुत जीव है। उसे जो जीवन में मिलता है उसे वह अपना अधिकार समझ झटपट दबोच लेता है और जो नहीं मिलता है उसकी प्रतिक्षा में उम्र भर अफसोस करता रहता है। क्या अजीत बाबु इन वास्तविकताओं और इंसानी कमजोरियों के ऊपर उठ पाएंगे? आपको क्या लगता है?





Saturday, June 28, 2025

পথিক! তুমি কি পথ হারাইয়াছো?

জীবনে প্রতি নিয়ত অনেক লোকের সংস্পর্শে আসা এবং তাঁদের আমাদের ব্যক্তিত্বের ও জীবন যাত্রার উপর নানা বিধ প্রভাব - এই অনুভূতি, এই আদান প্রদান, এই অভিজ্ঞতাগুলিই জীবন যাত্রার পাথেয় হয়ে দাঁড়ায়। এই সহ যাত্রীরা সব সময় আপনজনের তালিকা ভুক্ত নাও হতে পারে। অনেক এমন লোকের সাহচর্য পাওয়া যায় যারা প্রাথমিক ভাবে সম্পূর্ণ রূপে অপরিচিত কিন্তু তাঁদের ক্রমাগত সান্নিধ্য  তাঁদের আন্তরিক ভাবে পরিচিত  ও আপন করে তোলে। তাঁরা কখনো বন্ধু কখনো বরেণ্য কখনো অযাচিত ভাবে উপকার করে আমাদের ঋণগ্রস্ত করে রাখে সারাটা জীবন।

আবার কিছু কিছু এমন লোক আছে যারা আমাদের জীবনে কিয়ৎক্ষণ দেখা দেন আর তারপর কোথায় মিলিয়ে জান। তার মানে এই নয় যে তাঁরা স্মৃতি থেকে অবলুপ্ত হয়ে যান। বরঞ্চ এর উল্টোটাই হয় - তাঁরা বার বার মনের দরজা দিয়ে উঁকি মারেন। ভাবি এঁদের সঙ্গে যদি আরো ঘনিষ্ট পরিচয় হত তাহলে জীবনটা কি অন্য খাতে বইত?

তিনটি উদাহরণ দিই।

কলকাতায় কর্মসূত্রে কিছুকাল থাকাকালীন প্রায়শই দক্ষিণেশ্বরে যাওয়ার সুযোগ পেতাম। মায়ের মন্দিরের সামনেই নাট মন্দিরে সন্ধ্যাকালে গানের আসর বসত। ভক্তিরসে সিক্ত সেই সব সভায় সম্মিলিত হওয়া বিশেষ ভাগ্যের ব্যাপার মনে করতাম। এইরকমই একটি শ্যামা সঙ্গীতের আসরে এক মাদল বাদকের ব্যক্তিত্বে আকৃষ্ট হই। লম্বা মেদহীন গঠন । সুপুরুষ বলা চলে। খুব প্রাণ দিয়ে মাদল বাজালেন। মনে হলো বাদ্য যন্ত্রের মাধ্যমে যেন মায়ের আরাধনা করছেন। পরে তাঁর আরেক ব্যক্তির সঙ্গে কথপোকথন শুনে জানতে পারি যে উনি অনেক বছর পড়াশোনা শেষ করে বেকার ছিলেন। তখন মায়ের মন্দিরে প্রায় আসা যাওয়া করতেন। ইদানিং বিদেশে কর্মরত হওয়ার দরুন মায়ের দরবারে নিয়মিত হাজিরা দিতে অসমর্থ হলে ও যখনই সুযোগ পান চলে আসেন। শুনে মনে হয়েছিল এই লোকটিকে আরেকটু ভালো ভাবে জানতে পারলে মন্দ হত না। তবে সে সুযোগ আর হয়নি।

দ্বিতীয় জন আমার বাসের সহযাত্রী। প্রতিবেশী ও বটে। মাঝারি গড়ন। একমুখ দাঁড়ি। মধ্যবয়সী। কোনোদিন কথা হয়নি। পাশে বসেও না। ভদ্রলোকের মধ্যে একটা খেলোয়াড় খেলোয়াড় ভাব ছিল। হয়তো আলাপ হলে আরো ভালো ভাবে তাঁকে জানা যেত। হয়তো পরিচিতির ফলে আকর্ষন ও কিছুটা কমত। কিন্তু কোনোদিন তাঁর সঙ্গে কথপোকথন হয়নি এমনকি আবহাওয়া নিয়েও নয়। তারপর একদিন জানতে পারলাম ...যাক সে কথা...

তৃতীয় ঘটনাটি আরো মর্মান্তিক। বেঁটেখাট মানুষটি আমার সঙ্গে কথা বলতে ভীষণ উদগ্রীব। পাতলা শরীর। মাথাটা দেহের অনুপাতে বড়। আলাপ করতে চেয়েছিল। আমি করিনি। "অনেক কথা বলার আছে কিন্তু কী করে বলি বুঝতে পারছি না"। মনে মনে বলি, "তাহলে আর বলে কাজ নেই"। মুখ ঘুরিয়ে রাস্তা পার হই। এর পর আর কোনোদিন কথা বলার চেষ্টা সে করেনি।  কিন্তু একদিন আমার ব্যাগ থেকে টাকা পড়ে যেতে সেটা সসম্ভ্রমে আমাকে তুলে দেন। এখন ভাবি আমার তাঁর প্রতি এত উদাসীনতা হয়তো তাকে মনে কষ্ট দিয়েছে। হয়তো সে একজন নিপাট ভালো মানুষ ছিল। দু একটা কথা বললে কারোরই কোনো ক্ষতি হত না। কিন্তু সে সময় পেরিয়ে গেছে। রেখে গেছে শুধু আফসোস।

এরকম আরো অনেক ঘটনা... বলতে গেলে রাত কাবার হবে। এখন মনে করেও কোনো লাভ নেই। কিন্তু হঠাৎ হঠাৎ মনের দরজায় এরা টোকা যে মারে! তখন ভাবি এই সব বিস্মৃত মানুষরা কেন আসে মনের আঙিনায়? কি চায় তাঁরা? আমি কি চাই? এদের নাম দিতে?  কি নাম দেব? এদের পরিচয় কি? এরা তো সব অচেনা... আগন্তুক। তবে???

Friday, April 11, 2025

আসলে নকল




অনেকদিন পর একটা বাংলা ওয়েব সিরিজ দেখলাম। নারায়ণ সান্যালের সোনার কাঁটা অবলম্বনে । সিরিজটির নাম "কাঁটায় কাঁটায়"। খারাপ লাগলো না তবে...

ওই তবেটাই হলো মুশকিল। একবার পেঁয়াজের খোসা ছাড়াতে বসলে আর শেষ নেই। 

ছোটো করে বলি ।

এডভোকেট পী কে বাসু  সুজাতা মিত্র বলে একটি সুন্দরী মহিলাকে খুনের দায় থেকে বাঁচাতে গিয়ে কেতন দেসাই নামক ব্যবসাদারের পার্টনার কে দোষী সাব্যস্ত করেন। আসামির যাবজ্জীবন কারাদণ্ড হয়। জেলে থাকা কালীন আসামি (নাম ভুলে গেছি) একটি চিঠি লিখে জানান যে তিনি ন্যায়ের সেবা করতে গিয়েই খুনটা করেছেন। অতএব তিনি দোষী নন। যেহেতু কেউ তাকে বিশ্বাস করে না বা করবে না তিনি তাই আত্মহত্যা করাই বেছে নেন । এরপর এই মামলায় যুক্ত সবাই এক এক করে খুন হতে থাকেন। একটি দুর্ঘটনায় পী কে বাসুর কন্যাও মারা যায়। 

এদিকে সুজাতা কৌশিক দার্জিলিংয়ের কাছে একটি রিসর্ট খুলবে ঠিক করে। বলা হয়নি কৌশিক সুজাতার কেসে অভিযুক্ত ছিল। কেতন কে মারার জন্য দুটো গুলি চলে। একটি সুজাতার পিস্তল থেকে আরেকটা আততায়ীর আগ্নেয়াস্ত্র থেকে। কৌশিক ঘটনাস্থলে পৌঁছে সুজাতার হাত থেকে বন্দুকটি নিজের হাতে নিয়ে নেয় যাতে সে দোষী সাব্যস্ত হতে পারে। কিন্ত রাখে হরি মারে কে? কৌশিক আসল খুনী ধরা পড়ায় সসম্মানে ছাড়া পায়। 

তারপর প্রেম আরো গাঢ় হয়। আঁঠা হয়ে বিবাহ বন্ধনে সুজাতা কৌশিক আঁট হয়ে যায়। অতঃপর দার্জিলিং -  যেখানে কেতন দেসাই মামলার সঙ্গে সপক্ষে বিপক্ষে যারাই যুক্ত তাঁরা সবাই আমন্ত্রিত হয় রিসর্টের লাল ফিতে কাটার জন্য। এই আমন্ত্রিতদের মধ্যে খুনী ও শামিল। এরপর একে একে খুন হতে হতে বেঁচে যাওয়া। এবং শেষ মেষ  বাসু বাবুর গোয়েন্দাগিরির সুফল স্বরূপ ঘাতকের ধরা পড়া।

এবার ছাড়াই পেঁয়াজের খোসা ...

সুজাতা কেতন মামলার কথা বলি । সুজাতাকে কেতন নিজের বাংলো তে রাত্রি বেলা ডাকতেই সে কেনো গিয়ে হাজির হলো ?

ভালো মেয়েরা এরকম মাথামোটা কাজ করে ?

আরে নিজের সুরক্ষা তো নিজেকেই ভাবতে হয়। সুজাতা কী ভেবেছিল ? গড়বড় দেখলে গুলি চালিয়ে দেবে। তারপর কৌশিক তো আছেই ?

আচ্ছা তা নয় হলো কিন্তু সুজাতা পিস্তল কোথা থেকে পেলো ? পিস্তলের লাইসেন্স ছিল কি? কৌশিক ওখানে কী করে পৌঁছলো ? ভীষন বেশি কাকতালীয় হয় গেলো নয় কি ?

এবার কোর্ট  সীন।

এডভোকেট বাসু জজ সাহেব কে আততায়ীর গতিবিধি সম্বন্ধে অবগত করাতে গিয়ে বললেন " আমার মনে নয় ..." এই ভাবে আর কি খুনটি হয়েছে। "আমার মনে হয়..."? না হয় উচিত "আমার বিশ্বাস..."? সংলাপটি শুনে কানে খোঁচা লাগলো। আরে এডভোকেট সাহাব কানূন সবুত মাংতা হ্যায় "আমার মনে হয়" নেহি।

আসি দার্জিলিংয়ে।

ইন্সপেক্টর রমেন, যিনি সুজাতার কেসে ইনভেস্টিগেশন অফিসার ছিল, এখন দার্জিলিংয়ের কাঞ্চনজঙ্ঘা হোটেলে, যেখানে বাসু বাবু সস্ত্রীক উঠেছেন, এসে হাজির। মামলার পরবর্তী খুনগুলির ইনভেস্টিগেশন ও তাঁর হাতে। কিন্তু ইতিমধ্যে তিনি কেটি নামক এক নাইট ক্লাব সিঙ্গারের প্রেমে হাবু ডুবু খেয়ে পুলিশি কার্যকলাপ ও গতিবিধির কনফিডেনসিয়াল খবরাখবর নির্দ্বিধায় মেয়েটির সামনে ফোনে আলোচনা করে নিজের জীবনাবসানের পথ নিজেই প্রশস্ত করে ফেলেন। কেটি রমেন কে লাখ টাকার বিনিময়ে খুন করে। একজন দুদে পুলিশ অফিসার কী করে প্রেমে এরকম ভাবে ক্যালাতে পারে ?

রিসর্টে আসি।

প্লটটিকে ঘোরালো করার জন্য নানান হাইলি সাস্পিসিয়াস চরিত্রের সুজাতা কৌশিকের রিসর্টে অবতরণ । একজন ডাক্তার আর তার স্ত্রী যার সুজাতা মিত্র কেসের সঙ্গে কোনো সম্পর্ক নেই। একটি কথায় কথায় ধুমপানরতা দারুন স্টাইলিশ মহিলা এবং একটি আর্টিস্ট ছোকরা । একজন বার্কলে ইউনিভার্সিটির শিক্ষক যার বিনা অনুমতিতে যার তার ফোন ক্লিক করে ছবি তোলার শখ।

ডাক্তারের স্ত্রীর আবার সবরকম মনোবৈজ্ঞানিক রোগ আছে - ক্লেপটোম্যানিয়া ,  ঘুমের ঘোরে চলা মানে সোমনামবুলিসম ইত্যাদি।

তারপরে যা হয়ে থাকে। 

বরফ... ঝড়... ফোনের তার কাটা... যোগাযোগ বন্ধ... এর মধ্যে বাসু বাবুর অনুরোধে দার্জিলিঙ পুলিশের এক অফিসার রিসর্টে এসে হাজির খুনী কে ধরার জন্য... ইয়ে মানে বাসু বাবুকে খুনীকে ধরার্থে হেল্প করার জন্য। তিনি এসেই সবাইকে সন্দেহের চোখে দ্যাখা আর জেরা শুরু করা। জেরার ফাঁদে এমন কি বাসু বাবু পর্যন্ত জড়িত। 
দারুন সিনসিয়ার পুলিশ.. হুঁ হুঁ । 

এর পরে আর স্পয়লার না দিয়ে একটা ছোট্ট হিন্ট দিয়ে পেঁয়াজের খোশা ছাড়ানো বন্ধ করি।  যারা যারা আগাথা কৃষ্টির মাউসট্র্যাপ গল্পটি পড়েছেন তার সঙ্গে কাঁটায় কাঁটায়ের শেষ ক্লাইমেক্সের হুবহু সাদৃশ্য খুঁজে পাবেন। এটা কি কাকতালীয়? অথবা যাকে বলে ইনস্পায়ার্ড? না সম্পূর্ণ ভাবে লিফটেড ?

তবে পুরো সিরিজটা  দ্যেখার পর একটাই কথা মনে হয়। এত জল ঘোলা না করে সোজাসুজি কেতন দেসাইয়ের খুনের মামলায় অভিযুক্ত লোকটি  কাকে চিঠী বা সুইসাইড নোটটা লিখেছিল সেটার খোঁজ করলেই তো খুনী সহজেই ধরা পড়ে যেত । নয় কি ? কেনো চিঠিটি যাকে উদ্দেশ্য করে লেখা হয়েছিল তার পরিচয় শুরুতেই পাওয়া গেলো না বা ধরা পড়ল না সেটা বোধগম্য হলো না তো। 

হ্যাঁ তবে এত সহজেই খুনী ধরা পড়লে গল্পের গরু গাছে উঠতে পারত না তা ঠিক ।